Wednesday, September 16, 2009

हिन्दी दिवस – एक सोच

हमारी राजभाषा हिन्दी है। उत्तर भारत में हिन्दी पट्टी है जहां कई राज्यों की राजभाषा हिन्दी है। भारत के संविधान में इन राज्यों को ”क” श्रेणी में रखा गया है। संवैधानिक रूप से हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं, राजभाषा कहा गया है। 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को संघ के संविधान में राजभाषा का दर्जा दिया गया और संविधान में बाकायदा इस की व्याख्या की गई। राजभाषा के रूप में हिन्दी की विजय मात्र एक मत से ही हुई थी, ऐसा कहा जाता है। ‘क’ श्रेणी में हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार तथा सभी संघ शासित राज्य आते हैं। इस क्षेत्र को ही हिन्दी पट्टी कहा जाता है |

हिन्दी के राजभाषा बनने पर हिन्दी में एम.ए. किए ‘हिन्दी सेवियों’ की भी पूछ बढ़ी। कोयला से ले कर रेल मन्त्रालय तक हिन्दी अधिकारियों के पद सर्जित हुये। बैंकों में तो अच्छे ग्रेड में हिन्दी अधिकारी लगे। ऐसा भी समय आ गया था कि हिन्दी-विषय केवल लड़कियां ही लेती थीं। समय बदला और प्राईवेट कोचिंग अकेडेमियों में रतन, प्रभाकर पढ़ाने वाले हिन्दी अधिकारी लगने लगे। ‘हिन्दी’ के साथ ‘अधिकारी’ शब्द लगा तो आदर सूचक था। वेतन और ग्रेड भी आकर्षक था। यहां हिन्दी सही मायनों में रोटी रोजी के साथ जुड़ी।

किसी भी भाषा को राजभाषा बनाना सरकार की इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। मुगल काल में उर्दू-फारसी का चलन सरकार ने किया। आज भी गांव देहात के अनपढ़ बुजुर्ग सत्तर प्रतिशत उर्दू के शब्दों का प्रयोग जाने अनजाने में करते हैं। इसी तरह ब्रिटिश शासन ने अंग्रेजी को थोपा । आज भी ठेठ ग्रामीण महिलाएं कहती हैं, “आज मेरा मूड ठीक नहीं है या मैं बोर हो रही हूँ ।”

हिमाचल प्रदेश में ”हिमाचल प्रदेश अधिनियम,1975” पारित हुआ जिसके अनुसार प्रदेश की राजभाषा नागरी लिपि में हिन्दी घोषित की गई। इसी तरह की इच्छाशक्ति का परिचय दिया था हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मन्त्री शान्ताकुमार ने। उन्होंने सरकार से आदेश करवा दिये कि 26 जनवरी 1978 से सरकार का सारा कामकाज हिन्दी में होगा। इस आश्य की अधिसूचना 12 दिसम्बर 1977 का जारी की गई जिसमें मेडिकल कॉलेज, विधि विभाग और तकनीकी विभाग के अधीन औद्योगिक प्रशिक्षण को छोड़ कर सारा कामकाज हिन्दी में करने के आदेश थे। इस पर बहुत हाय-तौबा मची, हिन्दी टंकण यन्त्र न होने, हिन्दी स्टेनो-टाईपिस्ट न होने जैसे कई बहाने भी लगाए गये। किन्तु सरकार की इच्छा शक्ति थी तो हिन्दीकरण लागू हुआ। उस समय इसे हिन्दी में ”स्विच ओवर” कहा गया था। उस समय जो मुख्य सचिव थे, वे हिन्दी में हस्ताक्षर तक नहीं कर सकते थे। सब वाधाओं के बाबजूद भी ‘स्विच ओवर’ हुआ। हिन्दी टंकण, आशुलिपि का प्रशिक्षण सरकारी स्तर पर दिया गया। अग्रेजी टंकण मशीनों की खरीद, अंग्रेजी टाईपिस्टों, आशुलिपिकों की नियुक्ति पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया गया। जहां मुख्य मन्त्री जाते, रातों-रात सड़कों के मील पत्थर, सर्किट हाउसों के कमरे ‘कक्षों’ में बदल जाते। कोई भी अधिकारी मुख्य-मन्त्री को अंग्रेजी में फाईल प्रस्तुत नहीं कर सकता था। ऐसे में कई तरह के मजाक भी बने कि यदि कुछ अनुमोदित करवाना है तो हिन्दी में नोटिंग लिखो, सचिवों को हिन्दी पढ़नी आती नहीं, जो मर्जी हिन्दी में लिख डालो, अनुमोदित हो जाएगा।

हिन्दी के प्रचार के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उर्दू-फारसी, अंग्रेजी तथा स्थानीय भाषाओं के शब्दों को ज्यों का त्यों अपना लिया जाए और सरल से सरल आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया जाए। कुरता, पाजामा दरवाजा, खिड़की, कलम, दवात, स्कूल, अस्पताल, इंस्पेक्टर, बोर्ड, वारंट, डिग्री आदि ऐसे शब्द हैं जो आज एक ग्रामीण भी बोलता और समझता है। प्रचलन प्रयोग से फैलता है। आरम्भ में सचिवालय, मन्त्रालय, अभियन्ता, टंकक, अनुभाग, प्रशासन, आबंटन, अधीक्षक, निरीक्षक, सर्वेक्षक, परिचर, नियन्त्रक आदि शब्द अजीब लगते थे। आज इन्हें सभी प्रयोग करते हैं।

एक बार आरम्भ में एक संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत दिवस मनाने गए तो वहां कोई नहीं जानता था कि संस्कृत दिवस भी कोई दिवस होता है। अब तो आलम यह है कि हर दिन कोई न कोई दिवस है। कभी बाल दिवस है, कभी वृध्द दिवस; कभी दिल दिवस है तो कभी आंख दिवस; कभी सास दिवस है तो कभी बहु दिवस। यह दिवस अब विश्व स्तर पर मनाए जाते हैं। तो हिन्दी दिवस मनाने में क्या हर्ज़ है। कम से कम हिन्दी वालों को तो यह दिवस जोश से मनाना चाहिए। भाषा का विकास व्यवसाय से जुड़ा है। हिन्दी यदि रोटी भी देने लगी है तो इसे धूम से मनाईए।

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

अनुलेख : यह कृति अंतरजाल के सहयोग से लिखी गयी है | यह हमारी एवं कई और लोगों की सोच का मिश्रण है |

मुख्य अतिथि - सुरभि मिश्रा

नाम - सुरभि मिश्रा
आयु - 19
खेल - स्क्वैश
जन्म स्थान और निवास - जयपुर
WISPA में 2006 से शामिल
वर्तमान विश्व रैंकिंग : 240
पूर्व विश्व रैंकिंग : 233
सबसे ज्यादा विश्व रैंकिंग : 110 (जून 2007)
रैकेट : विल्सन
कोच : साइरस पोंचा
सफलता - हाल ही चेन्नई में अगस्त में आयोजित तेरहवीं महिलाओं के लिए जूनियर स्क्वैश विश्व टीम प्रतियोगिता में सेमी फाइनल में पहुँचने में सफलता हासिल की है |

Sunday, September 13, 2009

बॉसम की तैयारियों पर एक नज़र

अब जब बॉसम की शुरुआत में मात्र 3 दिन रह गए हैं ,परिसर में हलचल काफी बढ़ गयी है | सैक व जिम जी में खिलाड़ियों को अभ्यास करते हुए देखा जा सकता हैं | बॉसम हिंदी प्रेस ने बॉसम की तैयारियों के बारें में जानने के लिए खेल सचिव वी. वीरा विक्रम से मुलाकात की |

बॉसम के खेल सचिव वी. वीरा विक्रम वॉलीबॉल टीम के कप्तान हैं | इसबार बॉसम में प्रायोजकों की संख्या 2-3 गुना हो गयी है जिसके कारण इस वर्ष पुरस्कार की राशि में वृद्धि भी की गयी है | इसका मुख्य श्रेय वे बॉसम - स्पोंज और खुद की मेहनत को देते हैं | उन्होंने बॉसम का काम पिछले सेमेस्टर से ही प्रारंभ कर दिया था और इस वर्ष परिसर में आते ही काम में जुट गए थे जिसका फल इस बार बॉसम में प्रातभागी कॉलेजों की संख्या देख कर लगाया जा सकता है | पिछले वर्ष के 830 की तुलना में इस बार 980 से भी अधिक प्रतिभागी हैं , जिनमे आई . आई. टी. ( वाराणसी , राजस्थान, दिल्ली, कानपुर ) के छात्र भी सम्मिलित हैं | उन्होंने बताया कि बाहरी प्रतिभागियों के लिए रहने की जगह की कमी के कारण 980 से अधिक प्रतियोगियों को नहीं बुलाया जा सकता | 

उनका मुख्य कार्य सभी कोस्कानों में समन्वय बैठाना होता है | पहले सभी कार्यों में सिर्फ खेल सचिव निर्णय लिया करते थे पर उन्होंने इस बार इस प्रणाली को हटाकर निर्णय लेने के लिए सभी कोस्कानों और खेल सह-सचिव के मत को भी ध्यान में रखा गया है | उन्होंने स्थायी " लाइटिंग " सिस्टम लगवाने का भरपूर प्रयास किया किंतु आतंरिक मतभेदों की वजह से वह सफल नहीं हो पाया | इस बार बॉसम में सांस्कृतिक झलक के लिए 19 सितम्बर को एक " वेस्टर्न नाईट " का आयोजन किया जायेगा एवं उद्घाटन के दौरान क्षेत्रीय संघ भी अपनी प्रस्तुति देंगे |

इस बार की मुख्य अतिथि सुरभि मिश्रा होंगी ,जो अंडर-19 अंतर्राष्ट्रीय स्क्वैश प्रतिस्पर्धा की विजेता और कॉमनवेल्थ खेलों में 2 स्वर्ण पदक विजेता रह चुकी हैं | स्वाइन फ्लू के कारण प्रतियोगियों के कम होने की खबर पर उन्होंने कहा कि हमारी चिकित्सा व्यवस्था को देखते हुए किसी भी कॉलेज ने आने से मना नहीं किया है | हर बार की तरह बहुतया चर्चित बिट्स के पक्षपाती होने पर खेल सचिव ने बिट्स का समर्थन करते हुए कहा कि हर कॉलेज में ही ऐसा होता है जो कॉलेज मेजबानी करता है उसपर ये आरोप लगते ही हैं और इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए| 

बॉसम में इस बार पॉइंट बल और स्क्वैश प्रतिस्पर्धा का आयोजन पहली बार हो रहा है | इग्निशन इस बार फिर आतंरिक कारण से नहीं हो पा रहा है | पिछले कुछ दिनों की बारिश के कारण बॉसम की तैयारियों पर असर हुआ है, पर खेल सचिव ने अपनी सभी टीमों पर भरोसा जताया है | उनका जनता को सन्देश है कि वे बॉसम का भरपूर आनंद लें एवं बिट्स की टीमों को प्रोत्साहित करें | बॉसम हिंदी प्रेस की ओर से सभी टीमों को बॉसम के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं |